प्रदीप बनाम वोक् मीडिया – शब्द तो बहाना है, सत्य को दबाना है

हंगामा है क्यों बरपा,मुँह से निकला एक शब्द ही है,न्याय ही तो है माँगा,लिंचिंग तो नहीं की है. सड़कों पे नहीं बैठा,बेअदबी तो नहीं की है,कुछ सवाल ही हैं पूछे,दलाली तो नहीं ली है. सच्चाई उगलती, तीखे सवाल पूछती प्रदीप भंडारी की जिह्वा से हिंदी का एक आधिकारिक शब्द क्या निकल गया, तब से यह…

और क्या होंगे (कविता)

ये मिलें न मिलें,बात हो न हो,चर्चे तो होंगे. (3) जानते भी न हों,मानते भी न हों,चाहते तो होंगे. (6) चूंकि रात के ये साथी,दुनिया साथ देख पाती,तो आशिक़ ही होंगे. (9) ————————————————————– bhopal #hindipoem #kavita #hindi #chandtara

इमरान, आपने घबराना नहीं है (कविता)

बीते हफ्ते तालिबान खान का दिल भर आया संयुक्त राष्ट्र में प्री-रेकॉर्डएड स्पीच चलवाया अमरीका को निरा-कृतघ्न राष्ट्र बतलाया पाकिस्तान को वार ऑन टेरर का विक्टिम दिखाया पश्चिम पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया कश्मीर के लिए इमरान को बहुत रोना आया भारत को फासीवाद की गिरफ्त में बताया देखो ,मोदी ने बातचीत को आगे…

पलट! पलट! (कविता)

बहुत दिन से पलटू पलटा नहीं है,पलटे बिना मगर उसका गुज़ारा नहीं है,अब पलटेगा, कब पलटेगा,कयास लगाते रहिये,बीच बीच में जाति कीहवा बनाते रहिये.जाति की राजनीति उसके मन- प्राण हैं,जाति न चले तो फिर काम तमाम है.आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है,इसकी पलटने की इच्छा का आभास है,रोटी जब सिकती है तो पलटती ही…

अकबर के संतों से मिलने के नहीं हैं प्रमाण

किस्से-कहानियों का अकबर सर्वव्यापी है । बहुतेरे साधु-संतों के संग अकबर की मुलाकातों की किंवदंतियाँ प्रचलित हैं । बीरबल के किस्सों के हिसाब से अकबर सवालों, पहेलियों और गप्पों का भी बादशाह था । सत्यान्वेषी अकबर दीवान-ए-खास में बैठकर विभिन्न धर्माचार्यों के साथ धर्मचर्चाएँ किया करता था । बर्बर बाबर और कठमुल्ले औरंगजेब जैसे धार्मांध…

डंडे को प्रणाम है, डंडा ही समाधान है (कविता)

(डंडे से अभिप्राय दंड/punishment/कानूनी दंड से भी है और हाथ में पकड़े जाने वाले डंडे से भी) जो बैठ कर के सड़कों पर जो चीख-चीख गलियों में स्वतंत्रता का दंभ भर अभिव्यक्ति के नाम पर चरा रहे हैं बुज्जियाँ उड़ा रहे हैं धज्जियां कानून की, समाज की प्रधान की, विधान की शासन के सम्मान की…

फ़ाल्टन्यूज़ ने थूक के चाटा जब यूपी पुलिस ने मारा सच का चांटा

फ़ाल्टन्यूज़ नाम का एक गिरोह फर्जी खबरें बनाने, चलाने और सच के साथ छेदछाड़ कर नेटिज़न्स को बरगालने के काम में रिपब्लिक ऑफ ट्विटर पर अत्यधिक सक्रिय है । इस फ़ाल्टन्यूज़ को चलाने वाले दो वामपंथी दलाल – एक गंजा और किसी चिड़ियाघर से भागा एक भालू- किसी भी खबर में हेराफेरी कर उसे सत्यनिष्ठा…

फ़ेमिली मेन भाग 2 पर टीका-टिप्पणी : धृति बेटी तू जिहादीमर्दिनी, तेरी जय हो !

यह सिरीज़ वयस्क दर्शकों के लिए है और इसमे कहानी के समर्थन में अंतरंग दृश्यों सहित कटुवचन, अपशब्द और परिपक्व सामग्री शामिल है । फेमिली मेन की शुरुआत में ये दंभपूर्ण घोषणा मुझे बहुत थोथी जान पड़ी । मेरी इस ब्लॉगपोस्ट के लिए भी इस चेतावनी को लागू मानें। वैसे छूटते ही यह स्पष्ट कर…

वह कहीं नहीं गया (कविता)

उसका जाना तब तो जाना है अगर वह यादों से भी चला जाये वरना उसका फोन न उठाना संदेशों का जवाब न दे पाना दो-तीन सालों में किसी एक शाम को न मिल पाना यह सब पहले जैसा ही तो है कभी-कभार उसका ज़िक्र अब भी हुआ करेगा जब चार दोस्त साथ बैठेंगे उसके किस्से…

फूलों पर फिसले हुए (कविता)

फूलों पर फिसले हुए, पत्तियों के प्रति उदासीन, क्या ही मतलबी शौकीन ! रंगीनियत पर कुर्बान, चकाचौंध पर हलकान, गए-गुजरे लंपट आशिकों से ! (6) किसी ने कह दिया, वाह क्या रंग है ! क्या भीनी-भीनी गंध है ! भिनभिनाते भौरों से प्रेरित, मचलती तितलियों से मदोनमत्त, कसीधे पढ़ते रहे फूलों की शान में ।12।…

लौहपथगामिनी में दिव्य निपटान

(अगर आपको गंदगी , पाखाने और सच से घिन आती है तो कृपया आगे न पढ़ें , क्यूंकी यह ब्लॉग इन्हीं सब के बारे में है, और इसे पढ़ना भयावह हो सकता है ) वास्तविक टाइटल – “ट्रेन में टट्टी” बत्तीस घंटे का लंबा सफर है देवास से कोलकाता का । इतनी देर में किसी…

SL Bhyrappa’s Gruhabhanga (गृहभंग) – The Tale of a Woman’s Struggle against Poverty & Plague in pre-Independence Mysore

Bhyrappa’s semi-autographical masterpiece, Gruhabhanga, was published in 1970. In scope of its tragedy, and depth of the characters, the novel is perhaps unsurpassed in modern Indian literature. Gruhabhanga is the story of the heroic struggle of a woman, Nanjamma, who refused to give up in face of adversity and apathy. She battled against poverty, epidemic,…