रेलगाड़ी से तो कुकुर भलो  (वैचारिक यायावरी)

पल भर के लिए इस चित्र को निहारिए । मदोन्मत्त द्रुतवाहिनी, लौहपथगामिनी, छुकछुककारिणी सुदूर सुनसान में धुआँ उड़ाए कहीं से कहीं सरपट भागे जा रही है । क्या कहा कि न गति दिखती है, न ही छुकछुक सुनाई देती है ? संभव है इसलिए कि कल्पना और उमंग उड़ान भरती हैं, रेल की पटरी पर…