चप्पलतंत्र से चपलतंत्र तक (व्यंग्य)

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कैकईनन्दन भरत कहीं राजवंशी न होकर एक अफसरशाह मात्र तो न थे ? आखिर एक अधिकारी ही इतना कुशल हो सकता है कि पादुकाराज जैसे नीरस गल्प में प्रजा की आस्था को चौदह बरस तक जगाए रख सके । अजी चौदह की क्या कही , भरत अपनी सेवानिवृत्ति तक यह यथास्थिति बनाए रख सकते थे । आखिर उन्होने अपने रथ-महल इत्यादि सब त्याग दिये थे, और अल्प ट्रांसपोर्ट अलावेंस एवं एचआरए में निर्वाहन कर पाने हेतु एक कुटिया में शिफ्ट हो गए थे । ऐसा कर भरत ने राजसी ठाठ-बाट हथियाने के विजिलेन्स एंगल को भी कुंद कर दिया था । वैसे माता कैकई से सरेआम झड़पकर, मंथरा को डांट-डपटकर और राम-लक्ष्मण से विनती-मनुहार कर भरत जी ने स्वयं पर से हर प्रकार के संक्षय हटवा ही लिए थे । यूं भी जब ओवरनाइट पेलेस कू घटी थी, तब वे स्वयं अयोध्या में उपस्थित नहीं थे ।

उस जमाने की खड़ाऊँ और पादुकाएँ आज की चप्पलें हुईं । कुछ कम पढ़े लिखे, बदज़बान, बदतमीज़ नेतागण यह कहते हैं कि ब्यूरोक्रेसी की औकात चप्पल उठाने से अधिक की नहीं है । यहाँ वे यह नहीं समझ पाते कि सरकार चलाने के लिए नेता-मंत्री की चप्पल ही बहुत है, साक्षात उनकी कोई आवश्यकता है भी नहीं । चप्पल होने में सत्ता भले निहित हो, सत्ता का उपभोग लेकिन चप्पल उठा कर ही किया जा सकता है । ठीक ऐसे ही जैसे स्वर्ण का ! स्वर्ण अपने आप में मात्र एक धातु है, जिसका अस्तित्व अयस्क रूप में होता है । यह तंत्र का ही कमाल है जो मूल्य प्रदान कर उसे आकर्षक बनाता है, वरना पड़ा रहता कंचन धरा में दबा हुआ ।

वैसे ब्यूरोक्रेसी भले चप्पलें उठाती फिरती हो, चप्पलें चुराकर बेच देने(अर्थात स्वयं को बेच देने) का हुनर किन विशिष्ट लोगों के पास है, यह सर्वविदित हैं । यही नहीं चप्पलें खाने का सौभाग्य भी इसी वर्ग, यानि नेतागण, को ही मिलता है । हमारी व्यवस्था में किसी को भी चप्पलें मारने का हक़ केवल प्रजा को है। कुछ नेता यह मुगालता पाले फिरते हैं कि वे जनता का हिस्सा हैं । पब्लिक जूता-चप्पल-पैजार करके यदा-कदा उनके ऐसे भ्रम तोड़ती रहती है । वैसे चप्पल उठाने वाले अवश्य चप्पल मारने वाले समूह में सम्मिलित हो सकते हैं , क्यूंकी वे प्रजा का हिस्सा हैं । यहाँ कई नेताओं को अपने राजसी होने का अहंकार भी है । उन्हें लगता है कि सरकारी नौकरी वही लगाते हैं, और तनख्वा भी उनकी निजी तिजोरी से ही बंटती है । सरकारी कोष किसी नेता के बाप का नहीं होता, ऐसा समझ पाना किसी भी अल्पबुद्धि के लिए कठिन है । पोस्टिंग के लिए चाटुकारिता में तल्लीन चप्पलवाहक ही ऐसी धारणाओं को बल देते हैं ।

 एक अतिमहत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि अफसर किस प्रकार की चप्पलें उठाते हैं? अगर सब तरह की ही उठा लेते हैं, तो सबसे बढ़िया अंदाज़ में कौन सी ? हवाई चप्पलें, फ्लिप-फ्लॉप, सिंगल स्ट्रेप या कोल्हापुरी ? बाटा की, अथवा रिलेक्सो या लखानी की ? वैसे जहां तक मैं अफसरों को समझता हूँ, वे टाइप और ब्रांड सरीखे ओछे भेदभाव नहीं करते होंगे। मन लगाकर भली-प्रकार सभी चप्पलें पूरे सामर्थ्य से उठाने का जतन करते होंगे । जाति- धर्म- क्षेत्र जैसे भेद नेताओं के मन में ही पलते हैं ।

पढे-लिखे अफसर चप्पल भी अपने से नहीं उठा पाते, उनसे उठवाई जाती है., ऐसी गज़ब सोच रखने वाले अनपढ़, गरीब के बारे में क्या राय राय रखते होंगे, सोचकर दम घुटता है । ऐसे ही थोड़ी यह समाज सड़ गया होगा, यूँ ही इस देश में कर्मठ कार्यकर्ताओं को बंधुआ मजदूर नहीं समझा जाने लगा होगा । कर्मप्रधान जाति इसी तरह तो जन्म-प्रधान व्यवस्थित हुई होगी । वैसे स्मरण रहे ,चप्पल उठाने वाले और मारने वाले सदैव रहेंगे, पर स्वयं चप्पलें कब पादुका-खड़ाऊँ की तरह  मार्गदर्शक मण्डल में भर्ती कर दीं जाएँ, समय बतलाएगा । यह चप्पलतंत्र जिस दिन चपलतंत्र बन गया , तभी से ओछे,अहंकारी और अनुशासनहीन प्रतिनिधियों की छुट्टी हो जायेगी । शासन भी दुरुस्त हो जाएगा ।  

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