क्या था बाबर और उसके बाप का ख्वाब-ए-हिंदुस्तान ?

Hotstar पर हालिया रिलीज़ हुई The Empire में बाबर को अपने वालिद मिर्ज़ा उमर शेख के ख्वाब-ए-हिंदुस्तान को बहुत शिद्दत से लेते हुए दिखाया गया है । मिर्ज़ा उमर निहायती कमजोर शासक था – उसे नर्म दिल कहकर बेइज़्ज़त किया गया है । फ़रगना उससे संभलता नहीं था, समरकन्द जीतना उसकी हैसियत से बाहर था । उसकी सास एहसान दौलत उसकी बेफिक्रमंदी से चिढ़ती थी, और खुल्लम-खुल्ला तानाकशी किया करती थी । The Empire में तो एहसान दौलत मिर्ज़ा उमर को खाई में गिर कर मर जाने देती है, जिससे कि उसके चौदह बरस के नाती बाबर की ताजपोशी हो सके ।

ऐसे ढीले शख़्स को ख्वाब-ए-हिंदुस्तान कहाँ से आते थे ? यह उज़्बेग सरदार कभी अफगानिस्तान-उज़्बेगिस्तान से बाहर निकला नहीं, फ़रगना-समरकन्द से आगे कभी तूती बजी नहीं । यहाँ तक कि सिंध-पंजाब तब भी कभी बढ़ा नहीं । तो फिर इन ख्वाबों के दो ही जरिये (सोर्स) हो सकते हैं –

पहला, हदीसों में, जहां ज़िक्र है गजवा-ए-हिन्द का,

और

दूसरा, अपने पूर्वज तैमूर शाह मिर्ज़ा के नक्शेकदम पर चलना .

गजवा-ए-हिन्द पर कट्टरपंथी इस्लाम के पैरोकारों के तरह-तरह के बयान आते हैं – मसलन यह कुरान शरीफ में नहीं लिखा है , हदीसों में है । तो क्या हदीस बाध्यकारी नहीं हैं ? इसपर फिर इधर-उधर की दलीलें पेश होती हैं – मत्न और इस्नद में बात फस जाती है । पाकिस्तान और वहाबी जिहाद पर लांछन लगता है । हिन्द को इराक का बसरा तक करार कर दिया जाता है । कोई उलेमा कहता है कि गजवा तो कासिम और गज़्नवी सिंध और उत्तर भारत में पहले ही कर चुके हैं । कुछ इसे भविष्य में ईसा और महदी के पुनरागमन से जोड़ते हैं । कुल मिलाकर उसमें भरोसा हर मजहबी का है, बस भ्रम फैलाकर जवाबदेही से बचना चाहते हैं ।

खैर पैरोकार जो भी कहें, गजवा-ए-हिन्द हमेशा से एक ज़िंदा बम रहा है । आज की तारीख में तो पाकिस्तान गजवा के नाम पर ही जिहादियों को भारत के खिललफ रिक्रूट करवा रहा है । पाकिस्तान के टट्टू और कट्टर मुल्ले भारत को धमकाने के लिए किसी भी मौके पर गजवा का आह्वान करने से नहीं चूकते । भले ही छद्म-सेक्युयर इसे कितना ही नज़रअंदाज़ करना चाहें, गजवा-ए-हिन्द चौदह सौ साल से हमारी सभ्यता के लिए खतरा रहा है । आज अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश सनातन परंपरा से मुक्त हो चुके हैं । ये इस सिद्धान्त की सफलता ही काही जाएगी ।

रही बात तैमूर मिर्ज़ा की , तो भले आस्तीन के साँप अपनी औलादों के नाम उसपर रख लें , लेकिन उस लँगड़े हत्यारे का खूनी इतिहास छुपाया नहीं जा सकता । लंगड़ा हिंदुस्तान आया, रास्ते में और दिल्ली में ज़बरदस्त कत्लेआम मचाया और 1398 ई से ही जाने कितने जिहादियों की हौसला अफजाई करता आया है । मिर्ज़ा उमर शेख भले कबूतरों को चुग्गा खिलाने वाला नर्म-दिल सरदार रहा हो, पर था तो खानदान-ए-तैमूरिया का चिराग ही । लाखों बुतपरस्तों के खात्मे और बेशुमार दौलत की लूट के सपने उमर शेख मिर्ज़ा ने भी देखे होंगे , और बाबर को भी दिखाये होंगे । फल पेड़ से ज्यादा दूर नहीं गिरता, चाहे सड़ा हुआ ही हो । आने वाली पुश्तें अपने पूर्वजों की जूतियों में पैर डालने के ख्वाब रखती हैं ।

और फिर तैमुर ने हमले के लिए हिंदुस्तान को चुना भी तो कुरानी शगुन के आधार पर ही था । अमीरों के सामने तुर्किस्तान- चीन और हिंदुस्तान में से किसी एक जगह हमले का प्रस्ताव था, पर किताब के पन्ने पलटने पर तैमूर को दिल्ली की ओर कूच करने, और बुतपरस्तों को शिकन करने का हौसला मिला । ज़ाहिर है ये मुहिम गजवा-ए-हिन्द के तहत और मज़हब के नाम पर हुई थी ।

उमर शेख मिर्ज़ा का इंतकाल तब हो गया था जब बाबर महज़ चौदह बरस का था । उसके बाद उसकी महत्वकांक्षा की आग में फूँक देते रहने का काम उसकी नानी, एहसान दौलत ने किया । जैसे उमर मिर्ज़ा तैमूर का पांचवा वंशज था, वैसे ही एहसान दौलत चंगेज़ खान की तेरहवीं पुश्त थी । अल्तमश के वक्त चंगेज़ हिंदुस्तान में घुस नहीं पाया था । अरमान दिल में रह गए थे । एहसान दौलत को बाबर में तैमूर और चंगेज़ दिखा करते थे – कहने की ज़रूरत नहीं की बाप की तरह नर्म दिल तो न होगा !

बाबर तो तैमूर और चंगेज़ दोनों का ही वंशज था । लूट-खसोट उसके खून में थी । मजहब भी राह दिखाता है कि बुतपरस्तों के वतन को फतह किया जाये । फरगना उसके बस में कभी रहा नहीं, समरकन्द की सल्तनत भी आती-जाती रही । स्थायित्व मिला काबुल में , और दौलत मिली पंजाब से । लिविंग स्पेस की चाहत में बाबर को हिंदुस्तान की ओर बढ़ना ही था । पादशाह को अगर ग़ाज़ी बनकर सैंकड़ों काफिरों को कत्ल करने का मौका और कहाँ पर मिलता ?

बाबर बढ़ा, बाबर ने पानीपत-खनवा-चँदेरी लड़ाइयाँ जीतीं और हिंदुस्तान का इतिहास खून से भर दिया । उसकी जायज़ औलादें तो अब रही नहीं, पर नाजायज वाली मुग़लों के नाम पर सीना चौड़ा कर के घूमती हैं । चाहे खनवा युद्ध के पहले शराब छोडने और जिहाद करने की घोषणा हो, या चँदेरी का नरसंघार हो, नरमुंडों के पहाड़ बनाने के शौक हों या फिर मंदिर तोड़ने की – बाबर मिर्ज़ा पादशाहे ग़ाज़ी उसी राह पर चला जो तैमूर लंगड़ा दिखला कर कर गया था , और जिसका सपना उसका बाप देखा करता था ।


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