कुफ़्र-काफिर पर ऐतराज नहीं, झांट-झंटुए और *टुए पर है ? (निबंध)

परसों तक सब्र ही तोड़ते थे, कल कुफ़्र भी तोड़ दिया । सब्र का क्या है साहब । हम लोग काफिर हैं, बारह सौ साल से बुतशिकनों की नफरत खत्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं । कश्मीर में आज भी हमारे लोग मारे जा रहे हैं । शर्म बस हमें आती नहीं । क्रिकेट…

सड़कें हर काम के लिए हैं (कविता)

जाम करने के लिए हैं,                                  (चक्काजाम) जाम-से-जाम करने के लिए हैं,                            (शराब) दुआ-सलाम करने के लिए हैं, नित्य काम करने के लिए हैं,                            (पाख़ाना)     माहौल बने तो शाही हमाम करने के लिए हैं,                (स्नान) नाटक सरेआम करने के लिए हैं,                           (नुक्कड़ नाटक) चुनावी ऐलान करने के लिए हैं,                            (सभाएं) सारे कायदे हराम करने के…

प्रदीप बनाम वोक् मीडिया – शब्द तो बहाना है, सत्य को दबाना है

हंगामा है क्यों बरपा,मुँह से निकला एक शब्द ही है,न्याय ही तो है माँगा,लिंचिंग तो नहीं की है. सड़कों पे नहीं बैठा,बेअदबी तो नहीं की है,कुछ सवाल ही हैं पूछे,दलाली तो नहीं ली है. सच्चाई उगलती, तीखे सवाल पूछती प्रदीप भंडारी की जिह्वा से हिंदी का एक आधिकारिक शब्द क्या निकल गया, तब से यह…

झाँट पर झंझावात क्यूँ , भाषा पर भारी संस्कार क्यूँ ?

भाषा का कार्य है वस्तुस्थिति का वर्णन करना, और संवाद स्थापित करना । इसपर रह-रहकर नैतिक और राजनैतिक प्रहार होते रहते हैं । भाषा को भ्रष्ट करके न सामाजिक समरसता लाई जा सकती है , न ही शब्दों और विन्यासों को नियंत्रित अथवा प्रतिबंधित करके लोगों को संस्कारित रखा या बनाया जा सकता है ।…

और क्या चल रहा है ?

डीजल का शतक लग चुका है , पेट्रोल नेल्सन पर है । रसोई गेस नौ सौ पार कर चुकी है, जल्द ही हजारी भी होगी । आज लगातार सातवें दिन कीमतें बढ़ी हैं । विकास ऊंची उड़ान पर है – गुरुत्वाकर्षण को पर करके अन्तरिक्ष पहुँच गया है । उड़ान कंपनी टाटा हो चुकी है…

और क्या होंगे (कविता)

ये मिलें न मिलें,बात हो न हो,चर्चे तो होंगे. (3) जानते भी न हों,मानते भी न हों,चाहते तो होंगे. (6) चूंकि रात के ये साथी,दुनिया साथ देख पाती,तो आशिक़ ही होंगे. (9) ————————————————————– bhopal #hindipoem #kavita #hindi #chandtara

मंत्री का पिल्लू भाग गया (कविता)

चौकन्नों को चटनी चटाकर चूतियों को चकमा देकर   मुस्तैदों की माश चोशकर कर बंदोबस्त का बैंड बजाकर कानून व्यवस्था को धता बताकर पुलिस महकमे को गॉड दिखाकर भाग गया भई भाग गया मंत्री का पिल्लु भाग गया     (8) मुन्ना भैया कर कारस्तानी समन की करके नाफरमानी चंपत हो गया, बड़ा हरामी क्या उठा ले…

अमूल माचो एवं लक्स कोज़ी – उर्दूवुड की चड्ढियाँ

रश्मिका मंदाना गिनती ही भूल जाती है । तीन से चार तक आने में तीन दशमलव एक-दो-तीन हो जाती है । क्या है कि कमसिन कन्या की नज़र विकी कौशल के कच्छा स्ट्रेप पर पड़कर वहीं अटक गयी है- एकदम संज्ञा शून्य स्थिति । तानसेन को राग टोढ़ी गाता सुनकर मृग समूह जैसे कभी मंत्रमुग्ध…

इमरान, आपने घबराना नहीं है (कविता)

बीते हफ्ते तालिबान खान का दिल भर आया संयुक्त राष्ट्र में प्री-रेकॉर्डएड स्पीच चलवाया अमरीका को निरा-कृतघ्न राष्ट्र बतलाया पाकिस्तान को वार ऑन टेरर का विक्टिम दिखाया पश्चिम पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया कश्मीर के लिए इमरान को बहुत रोना आया भारत को फासीवाद की गिरफ्त में बताया देखो ,मोदी ने बातचीत को आगे…

चप्पलतंत्र से चपलतंत्र तक (व्यंग्य)

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि कैकईनन्दन भरत कहीं राजवंशी न होकर एक अफसरशाह मात्र तो न थे ? आखिर एक अधिकारी ही इतना कुशल हो सकता है कि पादुकाराज जैसे नीरस गल्प में प्रजा की आस्था को चौदह बरस तक जगाए रख सके । अजी चौदह की क्या कही , भरत…

भोजताल (कविता)

संध्या हो गई, उसे तो होना ही था सारी दीप्ति को तुझमें खोना ही था तेरे किनारे जो हम निकल आए टहलने मंद पवन में कामनाओं को मचलना ही था जाते जाते सब रंग गए बिखर जिधर भी देखूं तेरा प्रकाश फैला उधर लहरों को बहना है ऐसे ही रात भर मत्त बादल भटकेंगे कभी…

रेलगाड़ी से तो कुकुर भलो  (वैचारिक यायावरी)

पल भर के लिए इस चित्र को निहारिए । मदोन्मत्त द्रुतवाहिनी, लौहपथगामिनी, छुकछुककारिणी सुदूर सुनसान में धुआँ उड़ाए कहीं से कहीं सरपट भागे जा रही है । क्या कहा कि न गति दिखती है, न ही छुकछुक सुनाई देती है ? संभव है इसलिए कि कल्पना और उमंग उड़ान भरती हैं, रेल की पटरी पर…